चित्रा और मैं-8

पिछला भाग पढ़े:- चित्रा और मैं-7

शाम के साढ़े सात ही हुए थे जब पड़ोस वाली आंटी हमें बुलाने आयी थी। मतलब यह कि हमारे पास करीब आधा-पौन घंटा था पड़ोस में जाने से पहले।

बदमाशियों में पक्की माहिर चित्रा ने अपनी चूची चुसवाने के लिए आगे बढ़ते हुआ कहा “राज, तुम मेरी चूचियों से खेलो और मैं सोचती हूं कि आंटी के घर पे क्या करना है। मगर पहले तो यह है कि अगर आंटी ने हम दोनों में इंटरेस्ट दिखाया तो तुम उन्हें चोदने को तैयार रहना मेरे सामने, ओके?”

यह सुन कर मैं तो ऐसा चौंका कि अगर अपने आप को फ़ौरन संभालता नहीं तो चित्रा की चूची चबा ही ली होती। मैं बोला “यार चित्रा, तुम्हें भी हद की बदमाशी के अलावा कुछ सूझता ही नहीं क्या? अभी हम ना वहां पहुंचे, ना हमने खाना खाया, और ना तुमने आंटी को सही तरह से समझा, सीधे उन्हें मुझसे चुदवाने की दूर की सोच तक कैसे पहुंच गई?”

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